बैठे बैठे बोर हुये

Hello! आज मैं आप सबको कुछ बताना चाहती हूं जो मैंने एक्सपीरियंस किया है। एक ऐसी जगह जहाँ पर हम रोज़ कुछ न कुछ सीख रहे हैं, अपने एक्सपीरियंस से, अपने काम से । मैं निज़ामुद्दीन में बच्चों के साथ काम करती हूँ। शुरू शुरू में मुझे कई चीज़ें समझ नही आती थीं। “क्या करूँ”, “कैसे करूँ”, और सबसे ज़रूरी सवाल — “क्या मैं बच्चों के साथ काम कर सकती हूँ?” या “क्या मैं बच्चों के साथ काम करना भी चाहती हूँ?” बस यही सवाल मेरे मन में रहते थे।

मैंने बच्चं के साथ पहले भी काम किया है। मैं आगाज़ के साथ निज़ामुद्दीन के कटरा वाला स्कूल में बच्चों के साथ को-फैसिलिटेशन करती थी। धीरे धीरे मैंने निज़ामुद्दीन के पार्क में भी बच्चों के साथ काम करना शुरू किया। लेकिन फिर मैंने बीच में ये काम छोड़ दिया था क्यूंकि तब मुझे पढ़ाई करनी थी, और मेरे एग्ज़ाम आ गए थे। पर जब लॉकडाउन लगा तो हम सब वैसे ही घर में बंद हो गए। उस टाइम पर मैं काफ़ी बोर हो रही थी और काफ़ी अकेला महसूस करने लगी थी।

तब मेरे घर के आस पास के बच्चे मेरे घर में आते थे- कभी कैरम खेलने, तो कभी लूडो। मैंने सोचा, “क्यों नहीं मैं इन बच्चों के साथ कुछ एक्टिविटी करूँ?” मैंने उनके स्कूल के होम-वर्क में मदद करना शुरू किया। लॉकडाउन में बच्चों को स्कूल से कुछ शीट्स मिलती थीं, उनको होम-वर्क उस ही शीट पर करके देना होता था। मैंने उनके वर्क शीट को एक्टिविटी बना कर उनके साथ घर के अंदर ही गेम्स खेलना शुरू किया।

तब वो बच्चे मेरे लिए एक ऐसी जगह बन गए जहाँ पर हम दिन के कुछ घंटे एक साथ बिताते और बहुत मज़े करते! इंटरेस्टिंग बात यह हुई कि तब से वो बच्चे बार-बार मेरे घर आते रहते; 24 घंटे मेरे ही घर में आ कर बैठ जाते, और हर 2 मिनट में बस यही बोलते, “बाज़ी हम कब खेलेंगे?” कभी कभी तो मेरी मम्मी मुझे डांट भी लगा देती थीं, क्योंकि बच्चे अपने घर जाते नहीं थे, उनको मेरे घर में रहना अच्छा लगता था।

फिर मैंने उनके साथ अपना काम शुरू किया। शुरुआत मे तो बहुत गुस्सा आता था क्योंकि बच्चे सुनते नहीं थे। उनके साथ एक्टिविटी कराने में काफ़ी दिक्कतें आती थीं। पर क्योंकि यह एक सीखने की जगह थी, मैं चाहती थी यहाँ पर गलती होने पर किसी को डर न लगे। फिर धीरे धीरे मेरा बच्चों के साथ अच्छा रिश्ता बनने लगा। वो मुझे सुनते थे और मैं उनको सुनती थी। इस तरह से हमारा रिश्ता बनता गया। एक ऐसी जगह बन गई जहाँ पर हम सब एक दूसरे से कुछ ना कुछ सीख रहे हैं।

हम बच्चों के साथ कहानियाँ पढ़ना और बनाना, थिएटर एक्टिविटीज़, और हेंडीक्राफ्ट जैसी चीज़ें करते हैं। किताबों की कहानियों के ज़रिए हम बच्चों के साथ पेंटिंग, ड्रॉइंग, और नयी स्टोरीज़ बनाते हैं। एक बार मैं बच्चों के साथ एक स्टोरी पर काम कर रही थी जिसमें उनको तितली बना कर उसका नाम रखना था, और उसकी आवाज़ मुंह से बनानी थी। मैंने बच्चों से बोला था कि एक ऐसा नाम रखना है जो उन्होंने आज तक नहीं सुना हो। वो दिन मेरे लिए “wow moment” था क्योंकि उन्होंने ऐसे ऐसे नाम रखे जो मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी, जैसे कि: परपरपर , rose, freedom, etc. उन्होंने वो नाम नहीं रखा जो अक्सर पक्षियों के नाम होते हैं, उन्होंने कुछ अलग सोचा, और ये देख कर मुझे बहुत अच्छा लगा। एक बार तो मैं एक कहानी की कुछ लाइनें बच्चो को पढ़ के सुना रही थी। उन्होंने उसकी पूरी की पूरी स्टोरी बना दी। तब मुझे लगा कि बच्चों को कहानियाँ बनाना बहुत अच्छा लगता है।

थिएटर एक्टिविटीज़ के ज़रिये हम बच्चों को imagination, improvisation, images, eyeballing, mirror games etc. कराते हैं | एक सेशन में हम आँखें बंद करके कुछ imagination कर रहे थे जिसमे उनको अपने घर के आस पास की आवाजें सुननी थीं। किसी किसी को पंखे की आवाज़ सुनाई दी , किसी को मशीनों और चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी , and सबसे मज़ेदार बात यह थी कि कुछ बच्चों को जानवरों की भी आवाज़ें सुनाई दे रही थीं । एक बच्चा बोला- “दीदी मुझे शेर और हाथी की आवाज़ सुनाई दी!” और फिर सारे बच्चे बोलने लगे- “ हाँ, हाँ, हाँ, मुझे भी सुनाई दिया,” “कुत्ते की,” “हाथी की,” “भालू की,” “लोमड़ी की!” मुझे बहुत हँसी आ रही थी क्योंकि मुझे ऐसा कुछ नहीं सुनाई दे रहा था लेकिन सारे बच्चों को जानवरों की आवाज़ें सुनाई दीं।

हैंडीक्राफ्ट्स में हम सब कागज़, न्यूज़ पेपर, ड्रॉइंग शीट, रंगीन पेपर, इन सबसे हाथों से चीज़ें बनाते हैं। वैसे तो मुझे पहले हाथों से चीज़ें बनाना नहीं आता था, क्योंकि मुझे इंटरेस्ट नहीं था, और मुझे हाथों से चीज़ें बनाना अच्छा भी नहीं लगता है। पर जिन बच्चों के साथ मैं काम करती हूँ, उनको हाथों से चीज़ें बनाना अच्छा लगता है। तो मैंने भी धीरे धीरे हाथों से अलग-अलग, नयी चीज़ें बनाना सीखा। मैंने वीडियो देख देख कर तितली, चिड़िया, फूल, बॉक्स, पत्ते, यह सब बनाना सीख कर बच्चों के साथ ट्राई किया। पहली बारी में तो गलती हुई, सही से बना नहीं। पर बच्चों ने मेरी गलती को भी सपोर्ट किया। वो देखकर मैंने सोचा, “अब मैं अच्छे से सीखूंगी और फिर उनको अच्छे से सिखाऊंगी”। हुआ यह था की हम सब चिड़िया बना रहे थे। मैंने उसके पंख उलटे लगा दिए और यह बच्चो को दिख गया। पर बच्चों ने बोला, “कोई नहीं बाज़ी, अच्छा लग रहा है।“ उस दिन मैंने एहसास किया की कैसे गलती होने पर भी बच्चे संभाल लेते हैं और मेरा साथ देते हैं।

इसलिए मैंने यह जगह ऐसी ही बनानी चाही जहाँ पर सब कुछ सीख सकें और गलती होने पर किसी को डर न लगे। हम फसिलिटेटर्स भी अभी सीख ही रहे हैं। और सीखने में बहुत मज़ा आ रहा है। बच्चों के साथ काम करते करते मेरा patience level काफ़ी अच्छा हो गया है और सोचने का दायरा भी बढ़ गया है। अब बच्चों के साथ काम करके ऐसा लगता है जैसे मेरे पास और मेरे बच्चों के पास एक ऐसी जगह है जहाँ पर हम एक दूसरे से कुछ सीखते रहते हैं और यह जगह हमने मिलकर बनाई है।

Nagina is an actor and facilitator from Hazrat Nizamuddin Basti. She has performed in over 12 plays and is a founding member of Aagaaz. She has been involved in arts based work with multiple communities, including Nizamuddin Basti, Khirkee and Badarpur Jaitpur. Other than theatre she has been co-facilitating Aagaaz’s sessions on gender and sexuality through Darpan. Nagina has been a fellow with People for Parity, YP Foundation and the American State Department. She is a final year student at Aurobindo College, where she is pursuing B.A. Programme.

Illustrations by Jasmine

An arts based organisation dedicated to creating inclusive learning spaces that nurture curiosity and critical thought while creating safe spaces for dialogue.

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