काम के साथ साथ सीखना

आगाज़ में मैं एक और कदम बढ़ाकर एक और नई जिम्मेदारी संभाली है।

जब आगाज़ की शुरुआत हुई तो मैं बस अपने आप को एक अभिनेता की तरह देखता था। जैसे अगर कोई नाटक बना था तो मैं बस नाटक में अभिनय करने के लिए इच्छुक रहता था, जैसे जब ‘दुनिया सबकी’ नाटक बन रहा था तो किस तरह हम अपनी कहानी सोच कर उस पर नाटक बनाते थे। फिर ‘रावण आया’ नाटक बनना शुरू हुआ। और रावण आया नाटक बनने से पहले हमारा audition हुआ था और मुझे राम का role मिला था। मेरा मन रावण बनने का था लेकिन पता चला हमारे नाटक में रावण है ही नहीं। रावण आया के बाद मैंने रिहला’ नाटक के साथ काम करा और ये नाटक अभिनेता के रूप में मेरे लिए बहुत अलग अनुभव था। जैसे-जैसे नाटक करने तक पहुंचे, तो हम और बड़े हो गए थे, तो नाटक को समझने का तरीका भी हमारा बदल गया था।।

Rihla Rehearsal (2019) | L-R: Ismail and Nagina

लेकिन धीरे-धीरे मैंने देखा की मैं बस एक अभिनेता नहीं हूं, और मेरी ज़िम्मेदारी और सीख का दायरा बढ़ गया। जैसे अभिनय के अलावा मैंने lighting पर फोकस करा। और lighting operate और design कैसे करते हैं ये मुझे college से interest आया था। मैंने पहली बार college के नाटक में lights करे और मुझे बहुत अद्भुत लगा तो मैंने आगाज़ के एक नाटक “भागी हुई लड़कियों” में lights design और operation में interest दीखाया। मेरी इस इच्छा में अंकित पण्डे और आगाज़ ने काफी भरोसा दिखाया और बहुत सहयोग भी दिया इसे सीखने में। उसके बाद मैंने स्वतंत्र रूप से बाहर किसी और नाटक मण्डली के नाटक, ‘Beds’ में मैंने खुद light design और operate करा।

इसके साथ ही आगाज़ में मेरा facilitation पर training शुरू हुआ और हम पहली बार 2017 में श्रीनगर डीपीएस गए, वहां के बच्चों के साथ drama facilitation करने। हमारे साथ पुरी team थी तो इतना डरा हुआ नहीं लगा, और हमने काफ़ी कुछ सीखा। दिल्ली के Heritage School में मैंने co-facilitator के रूप में काम करा जो मेरे लिए एक बड़ा task था कि मैं अब किस तरह बिना ज़्यादा support के काम कर सकता हूं। हम फिर से डीपीएस श्रीनगर गए और इस बार पूरी टीम नहीं थी तो उतना ही ख़ौफ़ भी था क्यूंकी बहुत बड़े ग्रुप के साथ हमहे workshop plan करना था। लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगा की पिछली बार से बेकार काम हुआ; भले ही इस बार हमारा फैसिलिटेटर्स का टीम छोटा था लेकिन workshop उतना ही मज़बूत था।

फिर मैंने आगाज़ में और काम माँगा तो मेरी काबिलियत देख कर मुझे ‘ताना बाना’ का हिस्सा बनाया गया, जिसके अंतर्गत आगाज़ community से जुड़ा हुआ long term काम करता है। इस programme में मुझे बच्चों के साथ काम करने का मौका मिला और facilitation की और training मिलनी शुरू हुई। शुरुआत में मुझे नगीना के sessions को देखना होता था — वो बच्चों के साथ कैसे session करती है, उनको किस तरह engaged रखती है, क्या challenges आते हैं, और उनको कैसे संभालती है, आदि। फिर धीरे-धीरे मैं नगीना के साथ बच्चों के session लेने लगा और यही से मेरा part-time job शुरू हो गया। हम हफ्ते में 3 दिन session लेते हैं, और बच्चों के माता-पिता के साथ रिश्ता बना कर रखनाभी इस काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

आगाज़ में part time facilitation के अलावा मैं कुछ independent projects भी करने लगा था जैसे ‘Beds’ ’नाटक में lights करना, एक advertisement के लिए छोटे बच्चे cast करना और director को assist करना, ‘मिथ्याऔर ‘अगड़म बगड़म’ नाटकों में lights operate और set-up करने में help करना, आदि।

मुझे अपनी income और करनी थी तो मैंने आगाज़ में full-time job के लिए apply किया। मैंने बहार भी कुछ कुछ काम देखा था लेकिन मेरा मन नहीं लगा उन काम को करने का और मैंने आगाज़ को भी इसलिए चुना क्यूंकी मुझे यहाँ जिस तरह का काम होता है उसमें बहुत दिलचस्पी है और वो मुझे आता भी है।

आगाज़ में मेरे performance और बाहर के projects में मेरा काम देखते हुए मुझे आगाज़ में full time job करने का मौका मिला। लेकिन जब मुझे मेरा job role बताया जा रहा था तो मैं उस वक़्त काफ़ी nervous महसूस कर रहा था क्यूंकी कुछ-कुछ काम तो तो मुझे पहले से आते थे लेकिन कुछ काम (जैसे google sheets / docs, slack वगेहरा use करना)मेरे लिया बड़ा नया ह। खास्कर Slack (a messaging appp) मुझे बहुत ही अजीब लगता है, मुझे समझ नहीं आता उसका इस्तेमाल कैसे करूँ।

Part-time job के समय मुझे ज़्यादा जल्दी उठने की जरूरत नहीं पड़ती थी। अपने नयी job के पहले दिन पर ही मैंने सुबह की पहली एक meeting miss करदी क्यूंकी मैं आदत से मजबूर सुबह समय से उठ नहीं पाया। इतने काम के बारे में सोच कर और उसे करते हुए डर तो लगता है लेकिन मज़ा भी आता है और मेरी कोशिश है मैं अपना 100% दूँ।

--

--

An arts based organisation dedicated to creating inclusive learning spaces that nurture curiosity and critical thought while creating safe spaces for dialogue.

Get the Medium app

A button that says 'Download on the App Store', and if clicked it will lead you to the iOS App store
A button that says 'Get it on, Google Play', and if clicked it will lead you to the Google Play store
Aagaaz Theatre Trust

An arts based organisation dedicated to creating inclusive learning spaces that nurture curiosity and critical thought while creating safe spaces for dialogue.